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Karmic Indicators in the Horoscope

पुनर्जन्म एवं कर्म के सिद्धांत के दृष्टिकोण से, मूलतः समस्त कुंडली उन कार्यों को निरूपित करती है जिन्हें व्यक्ति को अपने वर्तमान जीवन में पूर्व जन्मों के अनुभवों एवं त्रुटियों को ध्यान में रखते हुए पूर्ण करना होता है।

किन्तु कुछ ऐसे प्रमुख बिन्दुओं का निर्धारण किया जा सकता है जो मुख्य कर्म विषयों एवं उन आयु कालों पर ध्यान केंद्रित करने में सहायक होंगे जिनमें कर्म का प्रभाव सर्वाधिक अनुभूत होता है।

1. चतुर्थ एवं दशम भाव की धुरी परम्परागत रूप से कर्म विषय से सम्बद्ध मानी जाती है। चतुर्थ भाव से हम देखते हैं कि हम कहाँ से आए हैं तथा दशम भाव से यह कि हम किस उद्देश्य हेतु बुलाए गए हैं एवं हम कहाँ जा रहे हैं। यहाँ केवल उन राशियों एवं डिग्रियों पर ध्यान नहीं देना है जहाँ इन भावों के कस्प स्थित हैं, अपितु इन भावों के स्वामी एवं कर्म विषय के प्रतीकात्मक संकेतकों की स्थिति पर भी विचार करना आवश्यक है।

2. यदि चतुर्थ एवं दशम भाव के स्वामी भिन्न-भिन्न ग्रह हों, तो प्रतीकात्मक संकेतक सर्वदा समान रहेंगे – ये हैं चंद्रमा एवं शनि। इन्हीं कारणों से इन ग्रहों को परम्परागत रूप से कर्म ग्रह कहा जाता है। चंद्रमा हमारे पूर्व जन्मों की परिस्थितियों, हमारे माता-पिता एवं वंश की विशेषताओं को निरूपित करता है। शनि किसी विशिष्ट राशि एवं भाव में उन समस्याओं एवं कार्यों को प्रदर्शित करता है जो वंश में पूर्व में पूर्ण नहीं किए गए थे, अतः व्यक्ति को इस विषय पर विशेष रूप से ध्यानपूर्वक कार्य करना होता है। यहाँ इन ग्रहों के चक्रों, क्रान्तिक बिन्दुओं, दशाओं (ग्रहों के विषय में व्याख्यान देखें) एवं सम्बद्ध आयु कालों पर विचार करना आवश्यक है।

3. कुंडली में कर्म विषयों के सर्वाधिक महत्वपूर्ण संकेतकों में चंद्र नोड भी हैं। इनके राशि, डिग्री एवं भाव में स्थित होने से पूर्व एवं नवीन आत्मिक अनुभवों का अनुमान लगाया जा सकता है। आयु सम्बन्धी गतिकी में नोडों की स्थिति द्वारा आरोपित प्रवृत्तियों के प्रकटीकरण हेतु नोडों के चक्रों पर ध्यान देना आवश्यक है जिनका पूर्व में उल्लेख किया गया है।

4. जन्म कुंडली में लग्न की स्थिति भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। रहस्यवादी दृष्टिकोण से यह भूत एवं भविष्य के मध्य की प्रमुख कड़ी है। ऐसा माना जाता है कि बारहवाँ भाव एवं उसका कस्प पूर्व जन्म का लग्न निरूपित करता है। यदि कुंडली को इस प्रकार परिवर्तित किया जाए कि बारहवें भाव का कस्प प्रथम भाव का कस्प बन जाए अथवा लग्न बन जाए, तो प्राप्त कुंडली पूर्व जन्म के विषय में प्रतीकात्मक रूप से जानकारी प्रदान कर सकती है। इसी प्रकार द्वितीय भाव के कस्प से हम भावी जीवन के विषय में कुछ अनुमान लगा सकते हैं।

5. वक्री ग्रह पूर्व जन्मों के अधूरे कार्यों को निरूपित करते हैं। इन ग्रहों के ट्रांज़िट एवं ट्रांज़िट ग्रहों द्वारा निर्मित दृष्टियों पर भी ध्यान देना आवश्यक है।

6. किसी भाव में प्लूटो की स्थिति जीवन के उस अनुभव क्षेत्र को प्रदर्शित करती है जिसे परिवर्तित किया जाना है। राशि एवं डिग्री इस अनुभव की प्रकृति को निरूपित करती है। अन्य ग्रहों द्वारा निर्मित दृष्टियाँ बताती हैं कि हम इस लक्ष्य को किस प्रकार प्राप्त कर सकते हैं। ट्रांज़िट, चक्र एवं ट्रांज़िट ग्रहों की दृष्टियों पर विचार करें।

7. यूरेनस की राशि एवं डिग्री इसकी प्रकृति तथा भाव इसकी उस क्षेत्र को निरूपित करता है जहाँ हमें जीवन की भौतिकता से ऊपर उठकर आध्यात्मिक मुक्ति प्राप्त करनी है, जिससे नवीन संभावनाओं के द्वार खुलें एवं कर्म ऋणों से मुक्ति मिले। अन्य ग्रहों द्वारा निर्मित दृष्टियाँ बताती हैं कि हम इस लक्ष्य को किस प्रकार प्राप्त कर सकते हैं। ट्रांज़िट, चक्र एवं ट्रांज़िट ग्रहों की दृष्टियों पर विचार करें।

8. नेपच्यून की स्थिति वाले भाव, राशि एवं डिग्री से यह ज्ञात होता है कि हम किस माध्यम से विनम्रता, दया, विश्व एकता, ईश्वरीय प्रेम, सृष्टि की अनन्तता का अनुभव कर सकते हैं, स्वयं को एक में विलीन कर सकते हैं, संभवतः स्वर्ग अथवा निर्वाण की प्राप्ति कर सकते हैं। अन्य ग्रहों द्वारा निर्मित दृष्टियाँ बताती हैं कि हम इस लक्ष्य को किस प्रकार प्राप्त कर सकते हैं। ट्रांज़िट, चक्र एवं ट्रांज़िट ग्रहों की दृष्टियों पर विचार करें।

9. कीरोन की स्थिति हमारे जीवन के सर्वाधिक जटिल एवं उलझे अनुभव क्षेत्र को निरूपित करती है। इनके समाधान सरल नहीं होते, किन्तु इसी अनुभव के माध्यम से हम जीवन के कठिन मार्ग से निकलकर ज्ञान एवं जीवन की समग्रता की समझ प्राप्त कर सकते हैं।

9. लिलिथ (काला चंद्र) की स्थिति पूर्व जन्मों की विकृतियों एवं त्रुटियों के साथ-साथ वंश एवं कुल के विषय में जानकारी प्रदान करती है। राशि, डिग्री, भाव एवं अन्य ग्रहों द्वारा निर्मित दृष्टियों पर विचार करें। ट्रांज़िट, चक्र एवं ट्रांज़िट ग्रहों की दृष्टियों पर विचार करें।

10. स्वेत चंद्र की स्थिति पूर्व जन्मों एवं कुल द्वारा अर्जित सकारात्मक अनुभव को निरूपित करता है। इसी जीवन में व्यक्ति उस क्षेत्र में आनन्द एवं कृपा का अनुभव करता है जहाँ स्वेत चंद्र स्थित होता है। विस्तृत विश्लेषण हेतु राशि, डिग्री एवं अन्य ग्रहों द्वारा निर्मित दृष्टियों पर विचार करें।

11. नक्षत्रों के साथ युति पर भी विचार करें, यदि ऐसी स्थिति हो। ऑर्बिस न्यूनतम रखें एवं अत्यन्त सावधानी से व्याख्या करें।

12. कुंडली की धुरियों पर उच्च ग्रहों की स्थिति भी जन्म के समय व्यक्ति के कर्म विषय एवं उसके विशेष उद्देश्य को निरूपित करने वाला अत्यन्त शक्तिशाली संकेतक होती है।

13. वृश्चिक राशि का पूर्ण होना (सूर्य, चंद्र अथवा लग्न का वृश्चिक में होना) तथा प्रथम भाव में प्लूटो की उपस्थिति व्यक्ति के परिवर्तनकारी उद्देश्य का अत्यन्त महत्वपूर्ण संकेत है। ऐसे व्यक्ति का जीवन सरल नहीं होता। परिवार में ऐसे बालक का जन्म सदैव वंश एवं पारिवारिक मूल्यों एवं जीवन शैली में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन की आवश्यकता को निरूपित करता है।

© नतालिया पेरेस्तोरोनिना

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