उद्घोषक ६ भाव का १० भाव में
ए. रिझोव. मूल कुंडली के भावों में स्थित भावाधिपति
लक्ष्य की प्राप्ति हेतु योजना बनाना, शुष्क एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कार्य करना तथा सेवा भाव रखना। लक्ष्य की प्राप्ति लंबे समय तक सेवा के मार्ग पर चलने से होती है। सभी सेवकों का पहलू।
भावों में स्थित भावाधिपति
नकारात्मक: ऐसा व्यक्ति लंबे समय तक ‘सिसिफस श्रम’ में लगा रह सकता है, जिसमें कुछ भी प्राप्त न हो सके। उन्नति के मार्ग में उसे अनेक बाधाओं एवं रुकावटों का सामना करना पड़ता है। सुखद अवसर बार-बार मिलते हैं, किंतु उनका वह बहुत कम उपयोग करता है। उच्चाधिकारियों से संबंध अच्छे नहीं हो सकते, क्योंकि उनमें उसे देखकर ईर्ष्या उत्पन्न हो सकती है। अन्य लोग ऐसे व्यक्ति को ‘ट्रंपलाइन’ (उछालने वाला साधन) समझकर उसका उपयोग अपने व्यक्तिगत करियर को आगे बढ़ाने हेतु कर सकते हैं।
सकारात्मक: ऐसा व्यक्ति स्वयं के परिश्रम एवं निरंतर प्रयासों से अपने द्वारा निर्धारित व्यावसायिक लक्ष्य को प्राप्त करता है। वह एक उत्कृष्ट पेशेवर के रूप में जाना जाता है, जिसमें धैर्य एवं परिश्रम का समन्वय होता है तथा जो अपने श्रम से ही सब कुछ अर्जित कर सकता है। दृढ़ व्यावहारिक दृष्टिकोण रखने वाला, कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारी तथा दूसरों की इच्छाओं का सफलतापूर्वक पालन करने वाला। ऊर्जाओं का सही उपयोग करने पर व्यक्ति ऐसा कार्य करता है, जो उसके ‘अहं’ की आवश्यकताओं को भी संतुष्ट करता है तथा करियर को भी बढ़ावा देता है। उसका कार्य सुव्यवस्थित होता है तथा वह जीवन में सुविचारित क्रम का पालन करता है। उसे अपनी उपलब्धियों पर गर्व होता है। समय की भावना रखने वाला तथा उच्च भार सहन करने में सक्षम होता है। प्रायः ऐसे लोगों पर अपने माता-पिता में से किसी एक द्वारा अत्यधिक दबाव डाला जाता है, जो उससे निरंतर अधिक कार्य करवाने की अपेक्षा रखते हैं। संभव है कि वह बाहरी परिस्थितियों द्वारा थोपे गए बंधनों से स्वयं को बंधा हुआ महसूस करे। नेतृत्व क्षमता रखने की संभावना भी रहती है। ऐसा व्यक्ति सफलता की ओर निरंतर प्रयासरत रहता है तथा अपनी गतिविधियों में सुधार लाने एवं अधिकतम संभव उपलब्धि प्राप्त करने हेतु प्रयत्नशील रहता है। वह दूसरों की बातों एवं उनकी राय के प्रति अत्यंत संवेदनशील होता है। ऊर्जाओं का दुरुपयोग होने पर व्यक्ति निरर्थक कार्य में अत्यधिक श्रम एवं शक्ति लगाता है, जो लाभकारी एवं उपयोगी कार्य के स्थान पर होता है।
इंदुबाला. भावों का अध्यक्ष भाव में स्थित (भारतीय परंपरा)
अपने परिश्रम का फल प्राप्त न कर पाना अथवा किसी भी क्षेत्र में निम्न स्थिति में बने रहना। ऐसा व्यक्ति पापी स्वभाव रख सकता है तथा स्वार्थी उद्देश्यों की पूर्ति हेतु धर्म का दिखावा कर सकता है। उसके अनेक शत्रु होते हैं।




