(«गुप्त जीवन» सं. 2, 2006) प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में कम से कम एक बार अपने जन्म और अस्तित्व के अर्थ के बारे में प्रश्न करता है। आत्मिक रूप से अभिमुख व्यक्तियों के लिए यह निर्विवाद है कि जन्म और जीवन सर्वप्रथम आत्मा के विकास, अनुभव प्राप्त करने से जुड़े हैं, और प्रत्येक मनुष्य के लिए यह अनुभव अद्वितीय तथा उसी के लिए आवश्यक होता है।
व्यक्तिगत ज्योतिषीय कुंडली में मनुष्य के पूर्व कर्मिक अनुभव को ध्यान में रखते हुए आत्मा के विकासात्मक कार्यक्रम को चंद्रमा के नोड प्रदर्शित करते हैं। एक योग्य ज्योतिषी केवल नोडों की स्थिति के आधार पर ही व्यक्ति के जीवन के उद्देश्य तथा उस मार्ग में आने वाली कठिनाइयों, बाधाओं एवं विकृतियों के बारे में बहुत कुछ बता सकता है। तो चंद्रमा के नोड क्या हैं? खगोलीय दृष्टि से ये चंद्रमा की कक्षा और पृथ्वी की कक्षा के प्रतिच्छेदन बिंदु हैं। वास्तविक ग्रह न होते हुए भी आकाशीय गोले पर स्थित इन बिंदुओं का नियति-निर्धारणकारी प्रभाव होता है तथा ये आत्मा के वर्तमान अवतरण में विकास के मुख्य वेक्टर को स्पष्ट रूप से निर्धारित करते हैं। यदि मनुष्य अपने «विकास वेक्टर» का अनुसरण करता है, तो जीवन उसे अपने साकार जगत में सफलतापूर्वक «कार्य करने» के सभी अवसर प्रदान करता है। किंतु यदि वह विपरीत दिशा में मुड़ जाता है, तो मार्ग में अनेक बाधाएँ, रोग, आपदाएँ उत्पन्न हो जाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप उसकी संरचना को आघात पहुँचता है और अंततः उसका विनाश हो जाता है।
आत्मा के विकास पथ, अर्थात आत्मिक विकास के पथ को सूचित करने वाला चंद्रमा का नोड राहु (उत्तर नोड अथवा पूर्वी नोड) कहलाता है। यह वर्तमान अवतरण का लक्ष्य प्रदर्शित करता है। यह सदैव आत्मा का नवीन अनुभव होता है। वास्तविक जीवन में यह एक सुदृढ़कारी कारक, प्रक्रियाओं का त्वरक तथा उत्प्रेरक होता है। इसके अतिरिक्त, राहु से व्यक्तिकरण, स्वयं को अलग करने तथा व्यक्तित्व के निर्माण की प्रक्रियाएँ भी जुड़ी होती हैं। यहाँ मनुष्य को दैवी सहायता प्राप्त होती है। प्रत्येक व्यक्ति सहज रूप से इस दिशा को अनुभव करता है। इस दिशा का अनुसरण करते हुए मनुष्य प्रत्येक बाधा को भावी विकास के मार्ग में परिवर्तित करने की क्षमता प्राप्त करता है। जैसे-जैसे वह नोड के निकट पहुँचता है, उसका जीवन नवीन अर्थ ग्रहण करने लगता है। किंतु दक्षिण नोड के उच्चतम पाठों को पूर्ण किए बिना उत्तर नोड तक पहुँचा नहीं जा सकता। व्यक्ति को अपने नकारात्मक आदतों, प्रतिक्रियाओं तथा जीवन-शैली को त्यागना सीखना चाहिए जो अब उसके जीवन के उद्देश्य की सेवा नहीं कर रही हैं।
दक्षिण नोड (अथवा पश्चिमी नोड) (केतु) अतीत की कुंजी है। यह संचित अनुभव को, चाहे वह सकारात्मक हो अथवा नकारात्मक, प्रदर्शित करता है। यद्यपि हम अपने पूर्व अवतरणों को स्मरण नहीं करते, किंतु हम अचेतन रूप से उनका अनुभव बार-बार उपयोग करते हैं, विशेषतः जीवन के प्रथमार्द्ध में। केतु के अनुसार व्यवहार करने से कोई भी प्रक्रिया मंद हो जाती है, सब कुछ भीतर की ओर धकेला जाता है, क्षीण होता है तथा विलंबित होता है। हमें अपने अतीत के अनुभव को समझना चाहिए, उसकी अधूरी सीखों को ध्यान में रखना चाहिए तथा उत्तर नोड अर्थात राहु के प्रति उपयुक्त निष्कर्ष निकालना चाहिए। किंतु प्रायः अतीत ही ऐसा आकर्षण उत्पन्न करता है जो हमें पुराने व्यवहार के तरीकों की ओर लौटने के लिए विवश करता है। मनुष्य सहसा पीछे मुड़ जाता है, अपने अतीत में डूबने के कारण को भूल जाता है तथा वास्तव में उसी को अपने अस्तित्व का उद्देश्य बना लेता है। दक्षिण नोड रेत के समान हो सकता है—उसमें केवल पीछे मुड़कर देखा जा सकता है, किंतु आगे कदम नहीं बढ़ाया जा सकता। एक कदम पीछे हटाने पर वर्षों अथवा दूसरों की सहायता की आवश्यकता हो सकती है ताकि वापस वर्तमान में लौट सकें। यदि मनुष्य अपने जीवन के उद्देश्यों को विपरीत दिशा में मोड़ देता है तथा अतीत के अनुभव को पुनर्जीवित करने का प्रयास करता है तथा उसे वर्तमान अवतरण का लक्ष्य बना लेता है, तो जीवन की परिस्थितियाँ नियति-निर्धारणकारी स्वरूप ग्रहण कर लेती हैं।
यह ए.एस. पुश्किन के कुंडली में अत्यंत प्रदर्शनीय है। उनका उत्तर नोड वृषभ राशि में तथा दक्षिण नोड वृश्चिक राशि में था। accordingly, उनका नवीन अनुभव सौंदर्य, कला, स्वयं की मूल्य-प्रणाली का निर्माण तथा सर्वाधिक महत्वपूर्ण रूप से, किसी भी परिस्थिति से सकारात्मक तरीके से बाहर निकलने की क्षमता से जुड़ा होना चाहिए था। वृश्चिक राशि में दक्षिण नोड की स्थिति प्रायः ईर्ष्या, नकारात्मकता के प्रति संवेदनशीलता, मनोवृत्ति तथा हेराफेरी जैसे विपरीत भावों को जन्म देती है। इसी केतु के गुणों के अतिरेक ने कवि के दुर्भाग्यपूर्ण अंत का कारण बना। इसके अतिरिक्त, घटना की नियति-निर्धारणकारी प्रकृति कवि की आयु—37 वर्ष—से भी स्पष्ट होती है, जो नोडों के प्रत्यावर्तन का काल है। (नोडों के कालों के बारे में बाद में)।
वृषभ राशि में राहु के स्वामी अनेक कलाकारों में मिलते हैं—जैसे राफेल, आयवाज़ोवस्की, बाल्ज़ाक तथा त्स्वेताएवा। इसके विपरीत, वृश्चिक राशि में राहु अपने स्वामी को इस जीवन में संकटों तथा क्षय के अनुभव प्राप्त करने, अपने सभी भयों का सामना करने तथा कभी-कभी इस जीवन के सच्चे नरक से गुजरने के लिए विवश करता है। साहित्य में वृश्चिक राशि के राहु के स्वामी एडगर एलन पो तथा गोਗोल थे। कर्क राशि में आरोहण करते चंद्र नोड की स्थिति अत्यंत रोचक है। यहाँ आत्मा के भावनात्मक अनुभव, पारिवारिक जीवन के अनुभव के अतिरिक्त व्यक्ति के लिए देशप्रेम तथा राष्ट्रवाद की भावना भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। आश्चर्य नहीं कि अनेक नेताओं में इस स्थिति का होना देखा गया है। यद्यपि उनमें से कुछ के राजनीतिक कार्यों की विवादास्पदता निर्विवाद है, फिर भी इस बात में कोई संदेह नहीं कि उन्होंने अपने देश के लिए सर्वोत्तम चाहा तथा वास्तव में उसके समस्याओं को अपने जीवन में अनुभव किया। ये हैं—अलेक्ज़ैंडर प्रथम, Serafim Sarovsky, वी.आई. लेनिन, आश्चर्यजनक रूप से हिटलर (जिनकी मृत्यु भी 56-57 वर्ष की आयु में नोडों के तीसरे प्रत्यावर्तन काल में हुई), फिदेल कास्त्रो तथा Gennady Zyuganov। मनुष्य के जीवन में चंद्र नोडों की व्यक्तिगत स्थिति से संबंधित विषय उसके जीवन के उन वर्षों में विशेष रूप से मुखरित होते हैं जो नोडों के प्रत्यावर्तन तथा प्रतिफल काल से मेल खाते हैं। यह एक प्रकार का जीवन-परीक्षा काल, कर्मिक परीक्षा काल होता है जिसमें कभी-कभी कठिन संकट काल तथा उत्तरदायी चयन की आवश्यकता होती है। चंद्र नोडों का पूर्ण चक्र 18.5 वर्ष का होता है तथा प्रतिफल काल 9.35 वर्ष का। प्रथम प्रत्यावर्तन 18-19 वर्ष की आयु में होता है। मनुष्य को अपने उत्तर नोड के विषय पर चयन करने के लिए कहा जाता है। यदि मनुष्य दक्षिण नोड के चयन की ओर गिरता है, तब भी इस आयु में कठोर परीक्षा नहीं होती क्योंकि मनुष्य अभी ब्रह्मांडीय बाल्यावस्था में होता है।
नोडों का प्रतिफल काल 27 वर्ष की आयु में होता है। इस समय मनुष्य आध्यात्मिक संकट से गुजरता है। उसके पास अपने अतीत के अनुभव को समझने तथा उसके बोझ से मुक्त होने तथा आगे बढ़ने का अवसर होता है। 37-38 वर्ष—द्वितीय प्रत्यावर्तन काल। यदि उसने अभी तक चयन नहीं किया है, तो मनुष्य के सम्मुख गंभीर परीक्षाएँ प्रस्तुत की जाती हैं जिन्हें पार करना संभव नहीं भी हो सकता (37 वर्ष की आयु में बेलिंस्की, पुश्किन तथा मायाकोवस्की का निधन हुआ)। 46-47 वर्ष—नोडों का प्रतिफल काल (बोदलेर तथा जे. एफ. कैनेडी का निधन हुआ)। 56-57 वर्ष—तृतीय प्रत्यावर्तन काल (सीज़र, नीत्शे तथा हिटलर का निधन हुआ)। आगे 65 वर्ष—प्रतिफल काल, 74 वर्ष—प्रत्यावर्तन काल तथा 84 वर्ष—प्रतिफल काल। समाचार-पत्र के लेख के प्रारूप के कारण चंद्र नोडों की सभी राशि-स्थितियों तथा नोडों के कालों से संबंधित विषयों पर विस्तार से विचार करना संभव नहीं है, और न ही हमारा उद्देश्य ऐसा है। अपने व्यवहार के उद्देश्यों तथा अपने जीवन के कारणों एवं परिस्थितियों को पूर्ण रूप से समझने के लिए सदैव एक पेशेवर ज्योतिषी से परामर्श लेना चाहिए। तथापि, चंद्र नोडों के विषय से परिचित होने से ज्योतिषीय ज्ञान से अनभिज्ञ व्यक्ति को इस प्राचीनतम विज्ञान की संभावनाओं को बेहतर रूप से समझने में सहायता मिलती है जो केवल भविष्यवाणियों तक सीमित नहीं है अपितु आत्म-ज्ञान के अनुभव को भी समृद्ध करता है।
लेखक: पेरेस्तोरोनिना एन.एम.





